मंचों का मशहूर युवा शायर : मिन्नत गोरखपुरी

‘नयी कलमें’ की अगली कड़ी में आपके सामने है एक ऐसा रचनाकार जो पेशे से इंजीनियर है और साथ ही उर्दू ज़ुबान का एक बेहतरीन शायर भी है.

उसका नाम है मोहम्मद मिन्नतुल्लाह ‘मिन्नत गोरखपुरी’.
मिन्नत का जन्म 1 जून 1995 को गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) में हुआ.

मिन्नत ने बाबू बनारसी दास विश्वविद्यालय, लखनऊ से एम. टेक. की शिक्षा प्राप्त की.
वर्तमान समय में मिन्नत गोरखपुर में रहकर साहित्य और सोशल वर्क से जुड़ा हुआ हैै.

मिन्नत गोरखपुरी


मिन्नत की कविताओं और ग़ज़लों में पुराने उर्दू शायरों की छाप दिखती है
वो ग़ज़लों को उन्ही की रीढ़ पर लेकर चलता है और दिन-ब-दिन इसे और बेहतर करने के प्रयास में लगा हुआ है.

मिन्नत कवि सम्मेलनों और मुशायरों से सक्रिय रूप से जुड़ा हुआ हैं.
उसने देश में आयोजित बहुत सारे मुशायरों में देश के बड़े-बड़े कवियों और शायरों के साथ शिरकत की है.
उसके उस्ताद प्रसिद्ध शायर डॉक्टर कलीम कैसर साहब हैं.

वर्ष 2019 में मिन्नत को मनोहर पर्रिकर सम्मान समेत कई सम्मानों से सम्मानित किया गया.
मनोहर पर्रिकर सम्मान के बाद मिन्नत ने कहा कि ये सिर्फ उसका नहीं बल्कि पूरे गोरखपुर के वासियों का सम्मान है.
अपनी मिट्टी से जुड़ा उसका प्रेम उसकी कविताओं में साफ झलकता है.

मिन्नत की कुछ ग़ज़लें –

1.

ताल्लुक़ात की सूरत संभालकर रखना
कोई न कोई महूरत संभालकर रखना

हर इक से मांग के शर्मिंदगी न हो तुमको
तुम अपनी सारी ज़रूरत संभालकर रखना

खुदा के बंदों ने कितने खुदा बना डाले
तुम अपने दिल की ये मूरत संभालकर रखना

ये कह दिया कि मैं तेरे ही काम आऊँगा
हमें बवक़्ते ज़रूरत सम्भालकर रखना

तुम्हारे दोस्त तुम्हे धोखा देने वाले हैं
मेरी पुरानी अदावत संभालकर रखना


मिन्नतुल्लाह ‘मिन्नत गोरखपुरी’

2.

इश्क़ में जान गंवा देने का दिल मे इरादा होता था
चार आंखों में और तो कुछ नहीं सिर्फ भरोसा होता था

ख़्वाब देखने की सब मे इक बीमारी सी होती थी
आंखें कम सुन्दर होती थीं सुन्दर सपना होता था

बचपन से ही रिश्तों का मतलब समझाया जाता था
सोने की गुड़िया होती थी हीरे का गुड्डा होता था

खून के रिश्ते, दर्द के रिश्ते, प्रेम के रिश्ते होते थे
रिश्तों में रिश्ते होते थे ऐसा रिश्ता होता था

कल तक अपने गाँव मे सम्बन्धों की फसलें उगती थीं
भय्या भाभी, चाची चाचा, मौसी ताया, होता था

मिन्नत को अफसोस यही है कहाँ गए वो सारे लोग
जिनकी प्यारी बातों में हर रंग निराला होता था ।

मिन्नतुल्लाह ‘मिन्नत गोरखपुरी’


ऐसे ही खनक के लिए पढ़ते रहें मोजो भारत.

मैं वापस आऊंगा फिर ऐसे ही किसी आर्टिकल के साथ तब तक के लिए धन्यवाद

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