फर्जी नारीवाद: ये कैसा नारी उत्थान जो ले रहा पुरुषों की जान!

मैं पहले ही बता दूं कि ये लेख मैं उन महिलाओं के लिए लिख रहा हूं
जो महिला होने का नाजायज फायदा उठाना बखूबी जानती हैं.



मैं खुद महिलाओं का बहुत सम्मान करता हूं
और हमारे समाज में उनके योगदान पर गर्व भी करता हूं
पर आज मेरे लिए इस मुद्दे पर लिखना बेहद जरुरी हो गया है
क्योंकि औरतों के लिए लड़ने वाले तो बहुत हैं
लेकिन महिलाओं द्वारा शोषित हो रहे पुरुषों के हक की आवाज कहीं खोती सी जा रही है.



अगर आप नारीवादी हैं,
अगर आप महिलाओं की तमाम समस्याओं पर मुखर रहते हैं
तो आपको सिक्के के दूसरे पहलू के रूप में मेरे इस लेख को जरूर पढ़ना चाहिए.

इस लेख में मैंने फर्जी नारीवाद पर कुछ सवाल उठाए हैं
जिसके जरिए उन पुरुषों की आवाज मुखर होगी जो कि
इस ‘फर्जी नारीवाद’ के पीछे छिप जाती है.



मैं लड़कियों के खिलाफ बिल्कुल भी नहीं हूं
पर हां कुछ लड़कियां हैं जो महिला होने का नाजायज फायदा उठाने से बिल्कुल भी गुरेज नहीं करती.

‘फेमिनिज्म’ के असल मायने

‘नारीवाद’ का सही अर्थ ‘लिंगों की समानता के आधार पर महिलाओं के अधिकारों की वकालत करना’ है.

फेमिनिज्म शब्द महिलाओं के समान अधिकार, शक्ति और समान अवसरों की वकालत करता है.


‘नारीवाद’ इस बात की वकालत करता है कि पुरुष और नारी समान है और उनके साथ कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए.

अब बात करते हैं आधुनिक नारीवाद की-
‘आधुनिक नारीवाद’ की परिभाषा ने नारीवाद के मूल मतलब को बदलकर नारीतंत्र को जन्म दिया है.

हक की लड़ाई के नाम पर कई महिलाओं ने पुरुषों को अपना शिकार बनाकर उनका शोषण किया.

जिस तरह बुरे लड़कों के कॉसेप्ट पर मोहर लगाई जा चुकी है
उसी तरह उन लड़कियों की भी कमी नहीं है
जिन्हें अपने स्वार्थ के आगे बेइमानी भी सही लगताी है.



मेरा मानना है कि सभी को एक ही चश्में से नहीं देखा जा सकता है.
अगर हम सब लड़कियों को एक कैटेगरी में नहीं डाल रहे तो
लड़कियों को भी कोई हक नहीं है
कि वो सभी पुरुषों को एक कैटेगरी में डालें.

फेमिनिज्म बराबरी का हक पाने के लिए शुरू किया गया मूवमेंट था,
पर कुछ महिलाओं के लिए ये फायदा उठाने का जरिया बन गया.
ऐसे में लड़कियां ही लड़कियों की दुश्मन बनती जा रही हैं.

लड़कियों को बेचारी बनाने वाली और कोई नहीं बल्कि खुद लड़कियां ही हैं.

इक्वालिटी के नारे लगाना तो बहुत आसान है,
फेमिनिज्म के झंडे फहराने तो बहुत आसान है
पर बात तब गंभीर हो जाती है
जब इसी नारीवाद को हथियार बनाकर पुरुषों का शोषण किया जाता है.

अगर कोई पुरुष गलत को गलत बोलता है तो
ये झूठा नारीवाद आगे निकल कर सच को झूठ साबित करने में
कोई कोर-कसर नहीं छोड़ता.

बेनकाब होता फेमिनिज्म

भारत के कानून में महिलाओं के संरक्षण के लिए कुछ कानून बनाए गए हैं
ताकि महिलाओं के साथ कोई नाइंसाफी ना हो.
लेकिन कुछ महिलाएं इन कानूनों का बड़े स्तर पर दुरुपयोग कर रही हैं.


कुछ महिलाओं द्वारा उत्पीड़न कानूनों का पुरुषों के खिलाफ दुरुपयोग तेजी से बढ़ रहा है.
महिलाओं के खिलाफ अपराध के बढ़ते मामलों की तरह
ये भी एक सच्चाई है और अब हमें इस बात को स्वीकार करना है.

पुरूषों के खिलाफ छेड़खानी समेत तमाम झूठे और खोखले मुकदमों की लम्बी लिस्ट है.
निसंदेह आए दिन फर्जी रेप और फर्जी छेड़खानी के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है.
इस वजह से वो केस भी कमजोर हो जाते हैं जो कि सच में अपराध के शिकार हुए हैं.

भारत के कई अखबारों ने दिल्ली महिला आयोग के आंकड़ों का सर्वे किया है
जिसमें पाया गया है कि दिल्ली में बलात्कार के मामलों में से 53.2 प्रतिशत,
अप्रैल 2013 और जुलाई 2014 के बीच दर्ज किए गए थे जो ‘झूठे’ पाए गए हैं.

ऐसी महिलाएं, जिन्होंने सहमति से संबंध बनाए हैं वो झूठी शिकायतें करती हैं


ताकि वह पुरुषों से पैसे निकालवा सके और उन पर दबाब बनाकर अपनी मतलब निकलवा लें.

इन अधिकतर झूठे केसों में निजी फायदे शामिल होते हैं.
कई बार तो महिलाओं के लगाए गए अधिकांश मामलों को
न्यायालय ने भी झूठा ठहराया है.
ज्यादातर दहेज प्रताड़ना, छेड़खानी, शोषण के मामलें झूठे हैं
और झूठे आरोप में फंसाए जाने के कारण ज्यादातर केस में
लड़का और उसके माता पिता बदनामी के ड़र से आत्महत्या तक कर लेते हैं.

लड़कियों तो झूटे कैस कर देती हैं
पर इससे लड़के और उसके घरवालों पर क्या गुजरती है,
कितनी बदनामी होती है, ये शायद उन्हें नहीं पता होता.

पुरुषों को बराबरी का हक क्यों नहीं!

वैसे तो हमारे समाज में समान अधिकारों के मुद्दे पर बहुत चर्चा होती है
पर जब बात पुरुषों के हक की होती है तो इस पर कोई चर्चा क्यों नहीं?


कानून का डर दिखाकर कुछ महिलाएं पुरूषों पर दबाव बनाती हैं
और अपना काम निकलवा लेती हैं.
यह डर हो भी क्यों नहीं क्योंकि इनके साथ जनता जो है.
आखिर महिलाओं को क्यों नहीं परखा जाता.

हर बार लड़कों को गलत ठहराना सही है क्या?

#Metoo पर झूठ बोलने से लेकर दहेज के झूठे आरोपों तक
अगर ये नारीवाद है तो ऐसा नारीवाद नहीं चाहिए हमें.

लम्बी लाईन छोड़ आगे चल देना नारीवाद है तो ऐसा नारावाद नहीं चाहिए हमें.

जो महिला अपने पति के साथ मारपीट करती है
और उसे सशक्त बता दिया जाता है
अगर ये नारीवाद है तो ऐसा नारीवाद नहीं चाहिए हमको.

क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि जो महिलाएं
पुरूषों पर भेदभाव करने का आरोप लगाती हैं
वो खुद ही कई जगहों पर भेदभाव करती हैं.

महिलाओं से लेकर जानवरों तक के लिए मंत्रालय हैं
किंतु पुरूषों की आवाज सुनने के लिए कोई नहीं है.

हमारे समाज में महिलाओं के अधिकार कोई नहीं भूलता है
और भूलने भी नहीं चाहिए लेकिन लड़को के
अधिकार सब क्यों भूल जाते हैं, क्या वो इंसान नहीं हैं.

मैने माना कि लड़को के लिए कोई अलग से कानून नहीं हैं
पर जो हैं वो तो उन्हें दे दो, वो तो उनका हक है.
महिलाओं को तो वो भी मिल जाता है जो उन्हें नहीं चाहिए.
नतीजतन लड़को के खिलाफ ये फर्जी कैस बढ़ेंगे
और कानून का गलत इस्तेमाल होता रहेगा.

अब पानी सर से उपर जा चुका है.
ना सिर्फ लड़कों को बल्कि लड़कियों को भी साथ मिलकर
सामने आना पड़ेगा और फेमिनिज्म की आढ़ में जन्म ले चुके
फर्जी फेमिनिज्म का अंत करना पड़ेगा.

मैं दोबारा दोहरा रहा हूं कि
मैं महिलाओं के खिलाफ नहीं हूं.
मैं महिलाओं पर सवाल नहीं खड़ा कर रहा हूं.
किंतु कुछ कथित महिलाएं हैं जो महिलाओं को अपनी ढाल बनाकर इस्तेमाल कर रही हैं,
और नारीवाद शब्द का गलत इस्तेमाल कर रही हैं.

जबतक ये समाज सोता रहेगा इसी तरह पुरुषों का
मानसिक और शारीरिक हनन होता रहेगा.
अपने हक और अधिकारो के लिए हमेशा लड़ना पड़ता है.

अगर आप अब भी इस लेख को पढ़ने के बाद मुझ पर महिला विरोधी होने का टैग लगा देना चाहते हैं
तो मैं उसे खुशी-खुशी स्वीकार करुंगा.

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