विशाल समर्पित : एक खुदरंग गीतकार

एक रचनाकार के गीत पढ़कर घंटो मौन बैठा रहता हूं,
क्यों?
पता नहीं.
शायद उसके बाद इस मन को वापस अपने आपे में आने के लिए समय चाहिए होता है
या शायद मैं खुद झूठ-मूठ का प्रेमी होने का अभिनय करना चाहता हूँ.

पता नहीं.

वास्तव में वो गीत नहीं बल्कि दो पागल प्रेमियों की अधूरी बात-चीत लिखता है.
कभी कभी सोचता हूं कि किसी गीतकार के शब्दों में इतना अधूरापन आखिर आता कहां से है,
जैसे एक मुक्तक में वो लिखता है –

आँख में सहसा सघन घन लौट आए
जा चुके थे दूर सावन लौट आए
चाहते थे हम सुनाना दर्द दिल का
देखकर पर अनमना मन लौट आए

जो गीतकार प्रेमिका के इतने करीब जाकर, उसकी सहूलियत के हिसाब से वहां से लौट आये उसे ‘विशाल समर्पित’ कहते हैं.

विशाल समर्पित

विशाल का जन्म 31 अक्तूबर 1994 को कन्नौज (उत्तर प्रदेश) में हुआ.
विशाल की शुरुआती शिक्षा कन्नौज से ही हुई, बाद में उन्होंने विज्ञान से अपनी ग्रेजुएशन पूरी की, लेकिन कहते हैं ना जिसको भाषा से प्रेम हो जाये उसको फिर और कुछ कहां भाता है,
यही विशाल के साथ भी हुआ विशाल ने विज्ञान में स्नातक करने के बाद हिन्दी से एम.ए. किया.


ये कमाल की बात है कि अगर आप विज्ञान से ग्रेजुएशन के बाद घर में कहें कि आपको कविताएं लिखनी है तो घर में स्टील के बर्तन भी टूट जाते हैं.
लेकिन विशाल का ये संघर्ष उनकी कविताओं में साफ दिखता है, विशाल दिन-ब-दिन साहित्य की सीढ़ियां चढ़ते चले जा रहे हैं.
यही संघर्ष विशाल से लिखवाता है –

प्रणय युद्ध में हारे मन को जीवन भर समझाना होगा,
माना बहुत कठिन है लेकिन फिर भी तुम्हें भुलाना होगा,

विशाल ने अपने गीतों के द्वारा मौजूदा साहित्य वातावरण में अपनी एक अलग पहचान बनाई है.
विशाल ने प्रेम पे तो गीत लिखे ही हैं, साथ-साथ समाज में व्याप्त बुराइयों, कुरीतियों के खिलाफ भी आवाज उठाई है.

विशाल के सभी पुराने गीत कविता कोश पर मौजूद हैं, नीचे मैं कुछ नये गीतों के जरिए आपको विशाल से अवगत कराता हूँ

१.

पाँव के संग धूल भी अंदर गई
द्वार पर हम पादुका से रह गए

गर्व था जिस पर हमें वह
रेत का घर ढह चुका था
आँसुओं का रूप धरकर
दर्द सारा बह चुका था

कौरवों की सत्यता को जानकर
कर्ण के जैसे रुआसे रह गए

देख व्याकुल आप आकुल
सँग हमारे आप रोये
वेदना के शुद्ध मोती
आँख ने उस रात खोये

गोपियाँ अंदर गईं कान्हा से’ मिलने
राधिका के प्राण प्यासे रह गए

स्वप्न टूटा और टूटा
कल्पना का तंत्र साँचा
हाय उसको कैसे’ भूला
रात दिन जो मंत्र वाँचा

चाँद अपना देखकर सबने पिया जल
हम उपासे थे उपासे रह गए

२.

मन्नत वाला धागा हमने
मिलकर साथ जहाँ बाँधा था
और जहाँ पर क़समें खाईं
थीं संग जीने मरने की
आज खड़ा मंदिर के पीछे
फिर से उसी वृक्ष के नीचे
देख रहा हूँ उस धागे को
जिस धागे ने बदल दिया था
मेरा जीवन मेरा अंतर
जिस धागे के कारण मैंने
स्वप्न अधूरे छोड़ दिए थे
जिस धागे के कारण मैंने
वैभव के घट फोड़ दिए थे
जिस धागे के कारण मुझको
कोई लड़की रास न आई
जिस धागे के कारण नदिया
तट के पास नहीं आ पाई
आज पुनः जब उस धागे को
आँखों ने जी भरकर देखा
स्याह मेघ आँखों में छाए
काश कि वो दिन याद न आए

मैंने तुमको रोका भी था
मत बाँधो ये धागा – वागा
क़िस्मत वाले सब खेलों में
बचपन से मैं रहा अभागा
क्षणभर में सब छल लेते हैं
मेरे मन की व्यथा यही है
मैंने बस झरना ही सीखा
पतझर मेरी नियति रही है
लेकिन तुम कब सुनती मेरी
तुमको अपने मन की करना
सखियाँ तुमसे कह भर दें बस
यह रस्म अधूरी रह जाए यदि
मिलना बहुत असंभव होगा
अशुभ अशुभ सा अनुभव होगा
पलभर में जाने तुम कैसे
कर लेती थीं सब तैयारी
याद आ रही आज मुझे फिर
विगत दिनों की वो नादानी
जिस नादानी के चक्कर में
ख़ुद ही ख़ुद को समझ न पाए
काश कि वो दिन याद न आए

मृगतृष्णा में भटके मृग ज्यों
पास देख जल धोखा खाते
वैसे ही कितने अबोध मन
मन्नत तृष्णा में फँस जाते
यदि ये धागे मिलवा देते
हर एक कहानी पूरी होती
शायद ही इस निश्चल जग में
कोई कथा अधूरी होती
धागा वागा भ्रम है मन का
खोना पाना क्रम जीवन का
ये सब ज्ञान पता है मुझको
फिर भी सोच रहा हूँ तुमको
खड़ा – खड़ा मंदिर के पीछे
हाँ हाँ उसी वृक्ष के नीचे
जिसके नीचे वचन भरा था
सदा हाथ में हाथ रहेंगे
जिसके नीचे ठान लिया था
हर स्थिति में साथ रहेंगे
जिसके नीचे हमने मिलकर
जाने कितने स्वप्न सजाए
काश कि वो दिन याद न आए


विशाल समर्पित

ऐसे ही खनक के लिए पढ़ते रहें मोजो भारत.

मैं वापस आऊंगा फिर ऐसे ही किसी आर्टिकल के साथ तब तक के लिए धन्यवाद.

One thought on “विशाल समर्पित : एक खुदरंग गीतकार

  1. मुझे इस हेतु समझने के लिए मोजो भारत का ह्रदय की असीम गहराइयों से आभार व्यक्त करता हूँ साथ ही ज्ञानेंद्र भाई को भी…❤️

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