रचनाकार : तथाकथित बुद्धिजीवी, सो कॉल्ड लिबरल

मैं एक ऐसे रचनाकार को जानता हूँ जो एक पूंजीवादी अमेरिकन कंपनी में काम करते हुए हिन्दी के विकास पर बेबाकी से बात करता है

वो कविताएँ कम, उसके प्रभाव पर ज्यादा बात करना पसंद करता है, वो घंटो तक सुना सकता है निराला की कविताएँ, दुष्यंत के शेर और प्रेमचंद की कहानियाँ.

वो साहित्य से जुड़े हुए बड़े-बड़े लोगों की आलोचना करने की ताकत रखता है, और आलोचना भी ऐसी वैसी नहीं, बल्कि पूरे तर्कों और सबूतों के साथ.

मैं बात कर रहा हूँ रचित दीक्षित की.
वैसे रचित आदमी बड़ा मज़ेदार है जब आप उससे पहली बार बात करेंगे तब भी वो आपसे ऐसे बात करेगा जैसे वो आपको कितनी सदियों से जानता है, उससे आप किसी भी मुद्दे पर बात छेड़ेंगे तो वो उसपर खुलकर बात करेगा, अब मुझे नहीं पता कि रचित कभी बनारस गया या नहीं लेकिन कहीं ना कहीं रचित ने वहाँ माथा ज़रुर रक्खा होगा जहाँ कभी कबीर ने अपने चरण कमल रक्खे होंगे, क्योंकि रचित में कबीर जैसी फक्कड़ता है।

वो लिखता हैं –

“लोग मर-मर के जीते रहे, और हम चाय पीते रहे,”
वो लिखता है –
“अगर एक कवि ने कविता में धमाका करने के लिए ‘तोप’ शब्द का प्रयोग किया तो कवि ने क्या किया! जो किया तोप ने किया.”

अरे हाँ एक बात तो मैं भूला ही जा रहा था, अगर आप रचित से उसके साथी कवियों के बारे में पूछो तो वो सिर्फ उनकी तारीफ़ें नहीं करता, वो बात करता है उनकी कमियों की, वो बात करता है मंचीय चाटुकारिता की, वो कहता है कि वो मंचों पर जाने के लिए मठाधीशों की चाटुकारिता नहीं कर सकता.

रचित दीक्षित


रचित का जन्म 10 जून 1992 को पीलीभीत में हुआ.

रचित बताता है कि जब उसने होश सम्हाला तो जो चीज़ उसके पास सबसे ज्यादा थी वो थी किताबें और किताबें भी ऐसी जिसे हम हिन्दी साहित्य का प्राण कहते हैं जैसे – चंद्रकांता, बेताल बत्तीसी, वेद-पुराण आदि।

रचित के पिता जी भी साहित्य से जुड़े हुए है, जैसा कि मैंने कई लोगों से इस बारे में बात की तो किसी ने कहा कि उसने कुमार विश्वास को देखकर लिखना शुरू किया वहीं किसी नें नीरज जी से प्रेरणा लेकर, लेकिन रचित के साथ ये बिल्कुल नहीं है, कविता उन्हें विरासत में मिली है।

जब मैंने रचित से उसकी विचारधारा पर बात की उसने बड़ी मज़ेदार व्याख्या की, रचित कहता है की अगर आप किसी लकी ड्रॉ कॉनटेक्ट में हिस्सा ले रहें है और उसमे आप के हिस्से में नीली गेंद आ जाए और तब अगर आप लोगों के बीच जाकर नीले रंग की गुणवत्ता पे बात करें तो कहीं ना कहीं वो मूर्खता है. ठीक उसी प्रकार हमारा धर्म हमे अपने चुनाव द्वारा नहीं मिला है, हमें अपना धर्म चुनने का अधिकार नहीं प्राप्त है, फिर भी अगर हम लोगों के बीच जाकर ये कहें कि नहीं हमारा ही धर्म सर्वोपरि है तो कहीं ना कहीं ये भी मूर्खता ही है, किसी एक विचारधारा से बंधना भी ठीक ऐसे ही है।

रचित की एक लाइन मुझे बहुत प्यारी लगती है कि – हर उस जगह जहाँ आप खड़े होने के लायक नहीं हैं, वहाँ खड़ा होना आपके पैरों का अपमान है, और ये आज का यथार्थ भी है क्योंकि मैं ऐसे शायरों को जानता हूँ जो बड़ी कम उम्र में विदेश तक पढ़ आये हैं, लेकिन अब इसके परिणामस्वरूप इतनी छोटी उमर में नीचे गिरना उन्हें खलता जरूर होगा.

रचित की कविताएँ हिन्दी साहित्य में जान डालती हैं.
वैसे रचित ने इतना कुछ लिख दिया है कि पढ़ते पढ़ते दिन बीत जाए.
फिर भी रचित की एक दो कविताएँ मैं नीचे लिख रहा हूँ, बाकी आप रचित दीक्षित को उनके फेसबुक पेज से भी पढ़ सकते हैं-

1) एक गीत –



प्रेम किसी निष्कासित कण का स्वयं सबल हो रवि होना है,
प्रेम सिर्फ दो आँखें पढ़कर मुझ जैसे का कवि होना है।

प्रेम किसी तपते मरुथल में पानी कहकर मुस्काना है,
प्रेम नए ज़ख्मों को पीर पुरानी कहकर मुस्काना है

प्रेम चांदनी सी दुल्हन का घोर अँधेरे से गौना है,
प्रेम किसी भटके साधू की मर्यादा का मृगछौना है।

प्रेम किसी बंसी वादक की कोई खोई धुन मिलना है
प्रेम बड़ों के पदचिन्हों से अपने पाँव बचा चलना है।

प्रेम किसी चन्दा का अभागे जुगनू की खातिर रोना है,
प्रेम चाँद को तकते-तकते धरती का होकर जीना है।

प्रेम सिर्फ कुछ यादों का ही संचित जीवन-धन होना है
प्रेम मेरा गंगा के तट पर बनकर धुंआ गगन होना है।

– रचित दीक्षित

2)
ब्रेकअप के बाद लड़के




ब्रेकअप के बाद लड़के

पड़ोसियों के लिए ज्यादा सहृदय पड़ोसी हो जाते हैं
दोस्तों के लिए फिर से उनके पहले वाले दोस्त हो जाते हैं,

बॉस के लिए टारगेट से ज्यादा काम करने वाले चीते हो जाते हैं
और
आसपास की लड़कियों के लिए हो जाते हैं
एक अबूझ पहेली।

ब्रेकअप के बाद लड़कों को बोरिंग नहीं लगता
इकोनॉमिक टाइम्स तक,
लगातार देख जाते हैं संदीप माहेश्वरी के 5-5 वीडियो
शशि थरूर की इंग्लिस समझने लगते हैं
अश्लील गानों में प्रेम ढूंढ लेते हैं
गालियों में लिटरेचर,
टैटू में शांति,
और रात में सुबह का इंतज़ार ढूंढ लेते हैं
एक कमरे में पूरा संसार ढूंढ लेते हैं।

ब्रेकअप के बाद लड़कों को
माँ बहुत याद आती हैं
हर रोज घर फोन करके,
छोटी बहन की पढ़ाई की चिंता को ज़िन्दगी में पहली
बार महसूस करते हैं,
यह भी पहली बार जान पाते हैं की
पापा का सेंस ऑफ ह्यूमर अभी भी पहले जितना ही मजेदार है।
और यह भी के गुड़गांव वाले अंकल इतने भी दूर के नहीं
की वीकेंड पर उनका फोन तक न उठाया जाए।

ब्रेकअप के बाद लड़के
हवा को महसूस करना सीख जाते हैं
जान जाते हैं की हवा पर किसी का नाम भी लिखा जा सकता है।
मजे की बात ये की लिखे हुए नाम को वे मिटाना नहीं भूलते
किसी का नाम छुपाना चाहते हैं वे।

ब्रेकअप के बाद लड़के
देर रात चाय की दुकान पर आकर बैठते हैं,
सड़क किनारे बेंच पर चाय पीते हुए
आसमान में सप्तर्ष मडल
और ध्रुव तारे के अगल बगल कोशिश करते हैं,
कुछ ढूंढने की इस कोशिश में वो
कई बार मंगल और शुक्र से आगे निकल जाते हैं।
वे तलाशते हैं एंड्रोमेडा गैलेक्सी की सम्भावनाओं को।
और अबतक अज्ञात कई आकाशगंगाओ,
कई सौर परिवारों,
कई ग्रहों को नए नाम दे डालते हैं,
सब उन्हें पहचानने लगते हैं
और
इस दौरान पूरा ब्रह्मांड यह जान चुका होता है
की धरती पर किसी का ब्रेक-अप हुआ है।

-रचित

मैं वापस आऊंगा फिर ऐसे ही किसी आर्टिकल के साथ तब तक के लिए धन्यवाद।।

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