नोबेल विजेता वैज्ञानिक: जिसने इजराइल के राष्ट्रपति पद को ठुकरा दिया

जर्मनी में 1930-40 का दशक त्रासदी का दौर लेकर आया था.
हिटलर के तौर पर उन्हें ऐसा राष्ट्राध्यक्ष मिला कि जिसने इस देश को गृहयुद्ध से विश्वयुद्ध तक ढकेल दिया.
इस देश में एक ऐसा वैज्ञानिक भी था जिसे अपने ही देश में नाजियों के अत्याचार को सहना पड़ा. परेशानी भी इस कदर कि वह जर्मनी छोड़कर अमेरिका में रिफ्यूजी बन गया.
आज किस्सा उसी नोबेल विजेता वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन का.

पुरस्कार की राशि पत्नी को मुआवजे के रुप में दे दी

अल्बर्ट आइंस्टीन ने पूरे जीवनकाल में सैकड़ो किताबें और पत्रों को प्रकाशित किया था.
300 से भी अधिक वैज्ञानिक और गैर वैज्ञानिक शोध पत्रों को प्रकाशित करने वाले आइंस्टीन को सन् 1922 में नोबल पुरस्कार से नवाजा गया. इस पुरस्कार में उन्होंने 32,350 डॉलर की राशि प्राप्त की.
मगर उन्होंने यह राशि उनकी पत्नी को तलाक के बाद मुआवजे में दे दी. 1999 में आई पुस्तक में बताया गया कि इस तलाक के बाद उनकी एक प्रेमिका भी थी. साथ ही यह भी कहा जाता है कि वह रुसी जासूस थी.

“बर्लिन छोड़कर पूरे जीवन के लिए एक पंछी बनने जा रहा हूँ”

साल था 1931, महीना दिसंबर का.
आइंस्टीन देश छोड़कर अमेरिका के लिए निकले.
उसी दौरान वह लिखते है कि वह बर्लिन छोड़कर हमेशा के लिए पंछी बनने जा रहे है.

(Pic: livescience.com)

संयुक्त राज्य अमेरिका में जाकर भी उन्होंने नस्लवाद जैसे मुद्दों पर बात की तथा नस्लवाद का जमकर विरोध किया था.
उनकी तब कैलिफोर्निया में नौकरी अस्थायी थी. परन्तु वर्ष 1955 में प्रिंसटन के न्यू जर्सी में स्थित इंस्टिट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज में उन्हें स्थायी नौकरी मिल गयी जहाँ वे अपने जीवन के आखिरी क्षणों तक काम करते रहे. जिस प्रकार नाजी पार्टी का प्रसार तेजी से हो रहा था, इस प्रसार के साथ 
उनके विचारों में भी परिवर्तन देखने को मिल रहा था.
आइंस्टीन ने उस समय यह मान लिया था कि शान्तिवाद कोई रास्ता नहीं है. उस समय का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा था कि हिटलर को सत्ता से कैसे हटाया जाये. उनकी स्पष्टता और मुखर विरोध ने जर्मन सरकार को बहुत नाराज़ कर दिया था, जिस कारणवश उनके वैज्ञानिक खोजों और उनके यहूदी होने पर लगातार हमले हुए. परन्तु इस सब से आइंस्टीन का हौसला कम नहीं हुआ.

जब इजराइल ने ऑफर किया राष्ट्रपति पद

1933 के बाद हिटलर ने सत्ता में आये तो एलान किया कि “यहूदी इस देश में नही रहेंगे, अगर उनके बिना विज्ञान नहीं होगा तो हम विज्ञान के बिना रह लेंगे.” ऐसे एलान के बाद 14 नोबल पुरस्कार विजेता व 26 प्रोफेसर पर गाज गिरनी तय थी.
वे हिटलर के खिलाफ अब और उत्साह से बोलने लगे थे. वर्ष 1930 से 1940 के दौरान उन्होंने इजराइली राष्ट्रपति रूजवेल्ट को पत्र लिखकर उनसे परमाणु बम योजना का समर्थन करने का आग्रह किया था.
हालाँकि, हिरोशिमा पर हुए परमाणु हमले ने उन्हें परमाणु बम को लेकर बड़ी दासी से भर दिया था.
इजराइल के प्रथम राष्ट्रपति चेम वीजमन ने उन्हें एक महान यहूदी कहा. वह एक नस्लवादी सरकार के खिलाफ आवाज उठा रहे थे और उन्हें किसी खास नस्ल से खुद को जोड़ना पसंद भी नहीं था. आंइस्टीन के लिए यह एक असहज टिप्पणी थी. 9 नंबवर 1952 को चेम वीजमन की मृत्यु के बाद उन्हें राष्ट्रपति पद का प्रस्ताव दिया गया, मगर उन्होंने विज्ञान की रुचि के चलते यह पद ठुकरा दिया.
अमेरिका की एक प्रतिष्ठित पत्रिका के पत्रकार द्वारा पूछे गये सवाल के जबाब में उन्होंने कहा था ना तो मैं यहूदी हूँ, ना ही जर्मन.

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