रचनाकार: जो अपनी प्रेमिका के फेसबुक स्टेटस को उपन्यास बनाना चाहता है


“क्या ढूढ़ रहे हो उसने कहा?
मैंने कहा ईश्वर।
उसने पलटकर फिर कहा
कैसा दिखता है वह ?
मैंने कहा पता होता तो ढूढ़ता ही क्यों!”


अहा! हिन्दी भाषा के व्यापार के युग में अगर कोई रचनाकार ऐसा कुछ लिख देता है तो मन गदगद हो जाता है, और तब तो उसमे और भी चार चाँद लग जाते हैं जब पता चलता है कि वो ऐसे ही लिखता है, जिसकी रचनाओं में निराला की व्याकुलता है, शरद जोशी का व्यंग है और जयशंकर प्रसाद की खनक है!

नमस्कार, ‘नयी कलमें’ की अगली कड़ी में हम एक ऐसे रचनाकार के साथ सफर करेंगे जो लिखता है –



“गड्ढा सड़कों पर मनुष्य द्वारा रचा गया सौंदर्य शास्त्र है.
बिना गड्ढों की सड़कें बांझ औरतों की तरह होती हैं जो किसी ख़बर तक को पैदा नहीं कर पातीं.”



“बुद्ध होने के लिए
किसी यशोधरा की आवश्यकता
नहीं होती”



“गिद्ध इसलिए भी लुप्तप्राय हो गए
क्योंकि देख लिया उन्होंने हमारे भीतर गिद्धत्व”

इस रचनाकर ने ऐसी सैकड़ो रचनाएं लिखी हैं जिसकी एक-एक लाइन अपने आप में पूरी रचना के बराबर हैं.
मुझे लगता है की जब वो रचनाएं लिखता होगा तब एक हाथ में आइना लेकर बैठता होता, या फिर एक चाबुक, लेकिन खाली एक कलम लेकर तो बिल्कुल नहीं बैठता होगा.

रचनाकार का नाम है – नरेन्द्र तिवारी, जिसे बच्चे प्यार से नरेन्द्र बाबा भी कहते हैं.
नरेन्द्र का जन्म 20 अगस्त 1990 को गोंडा (उत्तर प्रदेश) में हुआ, शुरुआती शिक्षा गोंडा से ही पूरी करने के बाद नरेन्द्र ने जाकिर हुसैन कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से हिन्दी आनर्स में स्नातक किया, बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय से ही हिन्दी में एम.ए. की पढ़ाई की.

उसके प्रेम लेखन की अदा भी बिल्कुल अलग है, वो कहीं दो लाइनों मे लिखता है –

तुमने जिस कविता को स्टेटस बनाया था
उसके उपन्यास होने की संभावना है.

हिन्दी अपने उस समय में है या यूं कहें की भाषा अपने उस समय में है जहां सोशल मीडिया पर इसका खुलकर प्रचार-प्रसार हो रहा है
और मुझे बहुत खुशी है की लोग सिर्फ चुटकुलेबाजों को ही नहीं बल्कि गीत चतुर्वेदी, एकता नाहर, सुशोभित और नरेन्द्र तिवारी जैसे हिन्दी के बड़े रचनाकारों को पढ़ना पसंद कर रहे हैं.

नरेन्द्र तुकबंदी करने वाले रचनाकारों से बिल्कुल अलग है, स्वतन्त्र कविता का महारथी नरेन्द्र कुछ ऐसा लिखता है –

1. चिड़िया उड़


उस रोज जब मैं यानी मनुष्य और वो यानी ईश्वर साथ बैठकर खेलने चले थे चिड़िया उड़!

पहली बारी ईश्वर की थी
ईश्वर ने कहा चिड़िया उड़
हम दोनों ने उंगली ऊपर उठा ली
और इस तरह इस ब्रह्मांड में पहली बार चिड़िया उड़ी !

अब मेरी बारी आई
मैंने कहा हाथी उड़ और अपनी उंगली उठा ली
मुझे लगा शायद हाथी भी चिड़िया की तरह उड़ सकता हो!
ईश्वर ने उंगली नहीं उठाई थी इसलिए हाथी नहीं उड़ पाया
यदि ईश्वर ने उठाई होती अपनी उंगली तो हमें उड़ते हुए हाथी दिख जाते

अब मेरी पिटाई की बारी थी
जब मैंने दोनो हाथ ईश्वर के सामने मार खाने को जोड़े
तभी से ईश्वर के सामने जुड़ने लगे सभी के हाथ

फिर से एक बार ईश्वर की बारी थी
उसने कहा कपूर उड़
मैंने उंगली नहीं उठाई
लेकिन ईश्वर से गलती हुई उंगली उठ गई
इस गलती से ही आज तक कपूर उड़ता रहता है
और ईश्वर को सजा नहीं मिलती

फिर आई एक बार मेरी बारी
मैंने कहा अफ़वाह उड़ और अपनी उंगली उठा सकने की मुद्रा में
नहीं उठाई इससे हुआ ये कि
ईश्वर ने जल्दबाजी में उंगली उठा दी

मुझे लगा ये मेरी जीत है पर नहीं ये हम दोनों की हार थी
तभी से मेरे और उनके बारे में उड़ती रहती है
बहुत सी अफवाह!
यदि ईश्वर ने नहीं उठाई होती उंगली तो
अफ़वाह उड़ ही नहीं सकती थी !

2 . “अंग दान आत्मकथ्य”




यदि मेरी आँखें किसी देह में खिड़की की तरह खुलें
तो चाहूंगा मेरी आँखों से देखने वाला बुरी नियत
और बुरी नज़र न रखे इस दुनिया पर.

यदि कभी कोई पा जाए मेरी किडनी
अपनी काया की ख़ातिर तो उससे चाहूंगा पिए शहद,
छाछ और तमाम गैरनुकसानदायक चीजें,
मदिरा से करे परहेज जैसे आग पानी से करती है.

जिसे भी मेरा धड़कता हृदय मिले
अपने सीने के पिंजरे में कैद करने वास्ते,
उसे दे दी जाए हिदायत सहृदय होने की
उससे यह शर्त रखी जाए कि जब-तब सबके सामने
न निकाल कर रखे मेरा हृदय.

मेरे मस्तिष्क को निकाल कर दे दिया जाए
उन डॉक्टरों को जो चाहते हैं मूर्खता पर परीक्षण करना.
मेरे मस्तिष्क को जिस भी ज़ार में रखा जाए उस पर लिख दिया जाए
दुनिया का सबसे खतरनाक अंग.

मेरे बचे हुए देह के टुकड़ों को भूखें पक्षियों
और जानवरों को देना सबसे ज़रूरी समझा जाये.
जब वे सभी नोच रहे हों मेरी देह कोई तस्वीर न उतारी जाए
इसका एलान कर दिया जाए.

मेरी हथेली को अग्नि के साथ इस तरह जलने को छोड़ दिया जाए
कि मेरा कर्म मेरे भाग्य के साथ धूं-धूं कर जल उठे.
मुझे आकाश और अग्नि ने इतनी आग और आकाश दिया
उसको एकसाथ वापस लौटा सकने का यही तरीका है.

मेरी एक कोई भी उंगली काट कर
इस धरती के हवाले कर दी जाए ताकि
चीटियां और दीमक मुझे मिट्टी में मिला सकें
और चुक जाए धरती से लिया ज़रा सा कर्ज.

पानी में बहा दी जाए निकाल कर मेरी जीभ,
पानी में रहने वाले कुछ देर के लिए ही सही तृप्त हो सकें
जीवन भर जो प्यास रही क्या पता आख़िर में इसी बहाने मिट सके.

ऐसे ही खनक के लिए पढ़ते रहें मोजो भारत.

मैं वापस आऊंगा फिर ऐसे ही किसी आर्टिकल के साथ तब तक के लिए धन्यवाद.

One thought on “रचनाकार: जो अपनी प्रेमिका के फेसबुक स्टेटस को उपन्यास बनाना चाहता है

  1. काबिलेतारीफ शख़्सियत की शानदार परिचय
    धन्यवाद मोजो भारत

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