कोटा: एजुकेशनल हब या सुसाइड सिटी

उसे मेडिकल और इंजीनियरिंग की तैयारी के लिए आदर्श शहर की संज्ञा दी जाती है. 
इस शहर के सैकड़ों संस्थान इस बात का दावा करते हैं कि उनके यहाँ पढ़ाई करना साफलता की गारंटी जैसा है. 
दिन के उजाले में कोचिंग संस्थानों के हजारों बैनरों से पटा पड़ा ये शहर अपने आप में एक अंधेरा भी समेटे हुए है.
एक अंंधेरा जिसने छात्रों से लेकर अभिभावकों तक को अपनी गिरफ्त में ले रखा है.
एक अंधेरा जिसमें सफलता के ख्वाब तो हैं पर साथ ही अनसुनी सिसकियांं भी हैं.
सिसकियां एक उदासी, निराशा, हताशा को समेटे हुए जिसने असमय ही अब तक कई घरों के ‘लाल’ लील लिए.
कई बच्चों ने पढ़ाई के दबाव में आत्महत्या कर ली.

सफलता की मंडी या आत्महत्या का गढ़

इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि कोटा के कोचिंग संस्थानों में अध्यनरत छात्रों की सफलता का स्ट्राइक रेट अन्य शहरों की अपेक्षा बहुत बेहतरीन होता है.
एक आकड़ें की मानें तो सफलता का ये स्ट्राइक रेट लगभग 30 फिसद का होता है.
एक तथ्य ये भी है कि मेडिकल और इंजीनियरिंग की प्रतियोगी परीक्षाओं में टॉप 10 की लिस्ट में 5 नाम आज भी कोटा में अध्ययनरत छात्रों के ही होते हैं.
लेकिन इन तमाम अच्छाइयों को समेटे हुए कोटा का एक डरावना चेहरा भी है.
यहां सिर्फ सफलता नहीं मिलती बल्कि कुछ छात्र असफल भी होते हैं.
ये असफलता कई बार छात्र बर्दाश्त नहीं कर पाते.
असफलता का ये अवसाद छात्रों को इस हद तक भी मजबूर कर देता है कि वो अपनी जान दे दें.

कई वर्षों से लगातार हो रही आत्महत्याएं

कोटा शहर अब आत्महत्याओं का गढ़ बनता जा रहा है.
यहां कोचिंग संस्थाओं द्वारा सपने बेचने का कारोबार हो रहा है.
कोटा एक तरफ जहां मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं में बेहतर परिणाम देने के लिए जाना जाता है, वहीं इन दिनों छात्रों की आत्महत्याओं के बढ़ते मामलों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में है.
कोटा पुलिस के अनुसार साल 2018 में 19 छात्र, 2017 में सात छात्र, 2016 में 18 छात्र और 2015 में 31 छात्रों ने मौत को गले लगा लिया. वर्ष 2014 में कोटा में 45 छात्रों ने आत्महत्या की थी, जो 2013 की अपेक्षा लगभग 61.3 प्रतिशत ज्यादा थी.

बड़ी-बड़ी नौकरियों को ठुकरा यहां पढ़ा रहे शिक्षक

कोटा में सफलता की बड़ी वजह यहां के शिक्षक हैं.
आईआईटी और एम्स जैसे इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र बड़ी-बड़ी कंपनियों और अस्पतालों की नौकरियां छोड़कर यहां कोचिंग संस्थाओं में पढ़ाने आ रहे हैं, क्योंकि यहां तनख्वाह कहीं ज्यादा है.
अकेले कोटा शहर में 75 से ज्यादा आईआईटी स्टूडेंट छात्रों को पढ़ा रहे हैं.

सैकड़ों कोचिंग, लाखों छात्र और करोड़ों का टर्नओवर

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कोटा कोचिंग सुपर मार्केट का सालाना टर्नओवर 1,800 करोड़ रुपये का है.
यहाँ के कोचिंग सेन्टर सरकार को अनुमानत: सालाना 100 करोड़ रुपये से अधिक टैक्स के तौर पर देते हैं.
देश के तमाम नामी गिरामी संस्थानों से लेकर छोटे मोटे 200 कोचिंग संस्थान यहां चल रहे हैं, जो प्रवेश परीक्षा का प्रशिक्षण दे रहे हैं.
आज की तारीख में यहां लगभग डेढ़ से दो लाख छात्र इन संस्थानों से कोचिंग ले रहे हैं.
कोटा की पूरी अर्थव्यवस्था कोचिंग पर ही टिकी है.
इस शहर की एक तिहाई आबादी कोचिंग से जुड़ी हैं.
ऐसे में कोचिंग सिटी के सुसाइड सिटी में बदलने से यहां के लोगों में घबराहट है कि कहीं छात्र कोटा से मुंह न मोड़ लें.
कोटा में छात्र जिस मानसिक तनाव से गुजरते हैं उसने इस शहर को पढाई का आदर्श शहर बनाने की बजाय अनसुनी सिसकियों के शहर में तब्दील कर दिया है जहाँ छात्र अपनी पीड़ा को मन में समेटे घुटता रहता है और कोई उसके भाव ना सुन पाता है ना समझ पाता है.

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