मुख्यमंत्री जिसकी कुर्सी जाने की वजह बना एक स्टिंग

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत इन दिनों चर्चा में हैं.
मामला एक स्टिंग से जुड़ा है.
दरअसल खबरें ऐसी हैं कि सीबीआई(CBI) रावत के खिलाफ एफआईआर(FIR) दर्ज करने की तैयारी में है.
इससे राज्य का सियासी माहौल गर्मा गया है
राजनीतिक करियर में चुनाव हारने के बाद से ही तमाम चुनौतियों से जूझ रहे रावत के लिए मुश्किलों में इजाफा तय है.
आखिर क्या है पूरा मामला!
स्टिंग के अलावा और कितने आरोपों से घिरा है यह दिग्गज नेता!
आज सीरीज के इस हिस्से में बात राजनीति में माहिर हरीश रावत की होगी.

जब ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ करते कैमरे में हुए कैद

तारीख थी 31 जनवरी 2014. उत्तराखंड के पूरे सूबे में बवाल मचा हुआ था.
तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा पर आरोप था कि केदारनाथ में आई त्रासदी के बाद राहत कार्य में लापरवाही की गई है.
इसके चलते बहुगुणा को मजबूरन इस्तीफा देना पड़ा. इस घटना के बाद सरकार की कमान हरीश रावत के हाथों में चली गई.
रावत को मुख्यमंत्री बनाए जाने के तत्काल बाद मुख्यमंत्री पद का सपना देख रहे सतपाल महाराज ने कांग्रेस छोड़ दी.
दो साल बीतने के साथ ही मार्च 2016 में पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के सहित कुल 9 कांग्रेस विधायकों ने भाजपा का दामन थाम लिया.
इस घटनाक्रम के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत का एक स्टिंग सामने आया.
दरअसल संख्याबल से जूझते नजर आते रावत कथित तौर पर विधायकों का समर्थन जुटाने के लिए लेन-देन की बात कर रहे थे. इसी दौरान उनकी यह सब बातचीत कैमरे में कैद हो गई.
इसके बाद जो हुआ वह जगजाहिर है. राज्य में 25 दिन के लिए राष्ट्रपति शासन लगा. हालांकि उसी दौरान कांग्रेस पार्टी ने केन्द्र में बैठी भाजपा सरकार पर भेदभाव का आरोप भी लगाया.

तीन साल पुराने इस स्टिंग का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आ गया है.

इस मामले पर हरीश रावत ने इशारों-इशारों में अपने सोशल मीडिया के जरिये बीजेपी और स्टिंग करने वालों पर व्यंग्य भी किया है.

एनएच 74 घोटाला: राज्य से लेकर केंद्रीय अधिकारियों पर उठते सवाल

Image: Google

एक ऐसा घोटाला जिसमें राज्य के कर्मचारी और केंद्रीय कर्मचारियों पर सांठगांठ का आरोप है.
दरअसल ये घोटाला नेशनल हाईवे-74 के निर्माण का है. नेशनल हाईवे-74 घोटाला उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर जिले से होकर जाता है.
इस नेशनल हाईवे के निर्माण में भूमि मुआवजा में घोटाला किया गया था.
इस घोटाले का दाग लगा, उत्तराखंड के पूर्व सीएम हरीश रावत की सरकार पर.
सरकार ने एनएच-74 को चौड़ा करने के लिए किसानों से भूमि अधिग्रहण किया.
इस पूरे मामले में कृषि भूमि का भू रूपांतरण (कृषि भूमि को अकृषि भूमि में बदलना) कर दिया गया, ताकि सरकार आसानी से जमीन अधिग्रहण कर सके.
मामला किसानों के नाम पर गलत तरीके से कई गुना अधिक मुआवजा वसूलने का है.
इस पूरे प्रकरण में अफसर लंबे समय तक लापरवाही करते रहे. मुआवजा राशि किसानों तक पहुंचाने की इस पूरी योजना में करीब 300 करोड़ का घोटाला सामने आया था.
घोटाले की जांच के लिये एसआईटी का भी गठन किया गया. किसानों से पूछताछ की गई.
इसमें उत्तराखंड के अधिकारियों के अलावा केंद्र के एनएचएआई अधिकारियों ने भी कथित तौर बड़ी लापरवाही की.
तो फिर यहां सवाल ये उठता है की 300 करोड़ का घोटाला हरीश रावत के नाक के नीचे कैसे हुआ?
आखिरकार इस पूरे मामले में मुख्यमंत्री रहते हरीश रावत की क्या भूमिका रही?

शराब में हुई 100 करोड़ की लूट!

मामले की शुरुआत 2014 से होती है. जब राज्य की बागडोर हरीश रावत के हाथों में थी.
दरअसल एफएल-2 के तौर पर हरीश रावत की तत्कालीन सरकार ने नई आबकारी नीति अपनाई. इसके बाद शराब के एक खास ब्रांड को प्रमोट करने के आरोप में हरीश रावत सरकार पर आरोप लगे.
बीजेपी ने सरकार से बाहर रहते इस नई नीति पर कई बार सवाल उठाए.
आरोप ये था कि 2014 के आम चुनाव के दौरान आबकारी नीति में बदलाव किए गए, जिसका फायदा शराब बनाने की एक खास कंपनी को पहुंचाया गया.
बता दें कि यह एफएल-2 घोटाला करीब 100 करोड़ रुपये का है.
मगर बात तो यह है कि इस मामले में बीजेपी ने भी सवाल खड़े करते हुए इसे बड़ा घोटाला बताया था. लेकिन आज जब विपक्ष जांच की मांग कर रहा है तो राज्य में बैठी बीजेपी सरकार कहीं सक्रिय नजर नहीं आई.
विपक्ष में मौजूद कांग्रेस के नेता अब बीजेपी की इसी नाकामी पर पलटवार कर रहे हैं.
सवाल यह है कि एक तरफ बीजेपी जांच पर गंभीर नहीं दिख रही है तो दूसरी तरफ कांग्रेस के राज में हुए इस घोटाले को लेकर कांग्रेस के ही नेता सवाल खड़े कर रहे हैं.

आवास योजना केन्द्र की, घोटाला राज्य का

शहरी क्षेत्रों के अंतर्गत झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले गरीबों का अपने घर का सपना पूरा करने के लिए इस योजना की शुरुआत की गई थी.
जून 2011 में केंद्र सरकार ने राजीव गांधी आवास योजना की शुरुआत की थी.
भीमताल नगर पंचायत को भी इस योजना के लिए चयनित किया गया था.
मगर ये योजना भी घोटाले की भेंट चढ़ गई.
इस नगर पंचायत में 107 आवास बनाने की दिशा में काम शुरू हुआ.
लेकिन आवास की गुणवत्ता और कुछ अयोग्य लोगों को योजना का लाभ देने की शिकायत के बाद योजना अटक गई.
कुछ लोग जो इस योजना के हकदार नहीं थे. ये ऐसे लोग थे जिनके पास पहले से पक्के आवास थे. उनको भी इस योजना का लाभ दिया गया.
गरीबों को आवास मुहैया कराने की योजना के विवाद में फंस जाने के बाद कई जरूरतमंदों के घरों का सपना अब तक पूरा नहीं हो पाया है.

इसके अलावा कई ऐसी ही योजनाएं और नीतियां हरीश रावत के तीनों अधूरे कार्यकालों के दौरान विवादों में रही.
ऐसा ही एक मामला था अनाज वितरण में हेरफेर को लेकर.
यह उत्तराखंड के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा अनाज वितरण में हुआ घपला था.
इस दौरान तो दस्तावेजों में 150 क्विंटल चावल 225 KM तक पहुंचाने का दावा किया गया. इस आनाज को थ्री व्हीलर वाहन में ले जाने की बात भी सामने आई. लेकिन यही शक गहराया कि आखिर जिस अनाज को पहुंचाने की बात कही गयी है उसे एक थ्री व्हीलर वाहन में कैसे ले जाया गया. साफ है, यह भी एक तरह का घोटाला था.
इस सरकारी अनाज के वितरण को लेकर सरकारी गोदामों में जमकर लूट- खसोट की गई.
लेकिन हरीश रावत मूकदर्शक बने रहे.

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