भूषण परिवार: जिसकी आदत है, सत्ता से पंगा लेना

अन्ना आंदोलन किसे याद नही होगा.
वो आंदोलन, जिसने कांग्रेस की सत्ता को इस कदर हिलाया कि 2014 के बाद देश भर से कांग्रेस का सफाया ही हो गया.
प्रशांत भूषण ने 2जी केस में जनहित याचिका के जरिए 2012 में जंतर मंतर पर बैठे आंदोलनकारियाें को कानूनी मदद दी.
मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल में भी राफेल का मामला कोर्ट तक ले जाने वाले प्रशांत भूषण ही थे.
एक मायने में यह कहा जा सकता है कि सत्ताधारियों को कोर्ट तक घसीटने में इनकी खानदानी आदत हैं.
क्योंकि ऐसे ही कई केस इनके पिता शांति भू्षण के नाम इतिहास में दर्ज हैं.
आज बात ऐसे ही एक केस की, जिसने इंदिरा गांधी को परेशान कर दिया था.

चुनाव: जिसके नतीजे पर अदालत में बहस हुई

1970 तक कांग्रेस के दो फाड़ हो चुके थे.
कांग्रेस का एक बड़ा खेमा तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ था. अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के कुल 705 सदस्यों मे से 446 सदस्य इंदिरा गांधी की तरफ लामबंद हो चुके थे. इसे कांग्रेस (आई) नाम दिया गया, आई का मतलब था इंदिरा गांधी. दूसरी ओर था अल्पमत में पड़ा कांग्रेस (ओ) का खेमा, जिसमें के. कामराज और मोरारजी देसाई जैसे दिग्गज नेताओं ने इंदिरा के खिलाफ खुलकर बगावत की थी.
इसी बीच इंदिरा गांधी ने 27 दिसंबर 1970 के दिन लोकसभा को भंग करके चुनाव का एलान कर दिया. 1970 के इस चुनाव में विपक्ष ने नारा दिया- “इंदिरा हटाओ”, तो इंदिरा गांधी का चुनावी वादा था- “गरीबी हटाओ”.
अफवाह उड़ी कि इंदिरा हार के डर से अपनी सीट रायबरेली से बदलकर गुड़गांव से लड़ेंगी. मगर ऐसा नहीं हुआ. इंदिरा की रायबरेली सीट पर उन्हें चुनौती मिली सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राज नारायण से. मगर जब 10 मार्च 1971 को नतीजे घोषित हुए तो राज नारायण की 1,10,000 वोट के अंतर से हार हुई.
जीत को लेकर आश्वस्त राजनारायण को यह नतीजा हजम नहीं हुआ.
मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट तक जा पहुंचा. राजनारायण की तरफ से वकील थे राजनीतिक मुकदमों को बिना फीस लड़ने वाले उस वक्त के मशहूर वकील शांति भूषण.

प्रधानमंत्री हाजिर हों

राजनारायण ने पूर्व प्रधानमंत्री पर पांच आरोप लगाये थे.
जब आरोप पत्र दाखिल हुआ तो उसमें कुल आठ आरोप शामिल किये गये थे. कुछ अतिरिक्त आरोप वकील शांति भूषण द्वारा भी जोड़े गये.
आरोपों की इन लंबी फेहरिस्त में बैलेट पेपर की गड़बड़ियों से लेकर इंदिरा गांधी द्वारा तय सीमा से ज्यादा चुनावी खर्च तक का आरोप था.
इस केस में तत्कालीन प्रधानमंत्री, पूर्व अधिकारी यशपाल कपूर और उस वक्त के मुख्य सचिव समेत पूरा दिल्ली दरबार कोर्ट में हाजिर हो गया था.
मुख्य आरोप था एक अधिकारी की नियुक्ति से जुड़ा, जिस पर सबसे ज्यादा बवाल हुआ था. दरअसल यशपाल कपूर जो कि प्रधानमंत्री कार्यालय में अधिकारी थे, उनकी नियुक्ति पर सवाल खड़ा किया गया. वकील भूषण द्वारा कहा गया कि इंदिरा ने सरकारी पद पर बैठे एक अधिकारी को चुनावी एजेंट नियुक्त किया था. जिसके लिए कहा गया कि यह ” रिप्रजेंटेशन एक्ट 1951″ का उल्लंघन है.

बैलेट पर था ऐसा केमिकल कि इंदिरा को वोट जाना तय था

याचिका में श्रीमती गांधी पर और भी कई गंभीर आरोप थे. जिसमें कंबल व शराब वितरण और मतदाताओं को बूथ तक लाने के लिए गाड़ियो का इस्तेमाल करने जैसे सवाल उठाये गये थे. इस चुनाव में एक किस्सा राजनीतिक गलियारों में आग की तरह फैल गया कि इस चुनाव में बैलेट पेपर पर एक स्याही का इस्तेमाल किया गया था. इससे वोट जिसे भी दिया जाता लेकिन वह दर्ज इंदिरा के नाम पर ही होता. यह कुछ वैसा ही आरोप था जैसा कि 2014 के बाद से ईवीएम हैक की चर्चा.
साथ ही साथ शांति भूषण ने याचिका में कई अहम बिंदु जोड़े. जिसमें शामिल थे- “इंदिरा द्वारा एयरफोर्स का विमान उपयोग में लेना और अधिक से अधिक अधिकारियों का चुनाव में इस्तेमाल”. मसला तो दरअसल चुनाव चिन्ह का भी था. इंदिरा द्वारा गाय और बछड़े का चुनावी चिन्ह के रुप में इस्तेमाल पर भी विपक्ष ने यह कहते हुए आपत्ति दी थी कि यह सांप्रदायिक कदम है.

Pic: Devbhoomisamvad.com

इंदिरा चुनाव तो जीत गई, मगर मुकदमा हार गई

अंत में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहन सिन्हा ने अपने फ़ैसले में इस बात को माना कि इंदिरा गांंधी ने चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया है. उनके चुनाव को खारिज करते हुए चुनाव के बाद बुलाए गए लोकसभा सत्र को असंवैधानिक करार दिया.
मामला सुप्रीम कोर्ट में जाने के बाद इंदिरा गांधी की तरफ से पैरवी करने के लिए हाजिर हुए मशहूर वकील एन पालखीवाला. सुप्रीम कोर्ट जस्टिस अय्यर ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले पर स्थगन काआदेश दे दिया, लेकिन यह आंशिक स्थगन आदेश था.
आदेश के अनुसार इंदिरा गांधी संसद की कार्यवाही में भाग तो ले सकती थी लेकिन वोट नहीं कर सकतीं. सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले से इंदिरा गांधी की लोकसभा सदस्यता तो बच गई मगर उनके संवैधानिक शक्तियां सिमित कर हो गई.

24 जून 1975 के इस फैसले के बाद विपक्ष ने इंदिरा गांधी पर हमले तेज़ कर दिए और नारा गूंजा : सिंहासन खाली करो कि जनता आती है.
रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण की रैली हुई. फिर जो हुआ वह भारत के लोकतंत्र में काले अध्याय के तौर पर जुड़ गया. इंदिरा गांधी ने 25 जून को आधी रात में ही आपातकाल की घोषणा कर दी.

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