शाद : शायर नए रंग का

पिछले एक- दो दशक में हिन्दी-उर्दू नें एक बार फिर अपना स्वर्णिम समय देखा है.
बहुत सारे नये-नये लड़के भाषा के विकास पर चर्चा कर रहे हैं,
मुझे ये देखकर मज़ा आता है कि ये नये लड़के नया प्रयोग करने में बिल्कुल हिचक नहीं खाते हैं.
और इसी हिट-एंड ट्रायल प्रयोग से एक बेहतरीन शायर निकल कर आता है जिसको हम शाद कहते हैं.

शाद का पूरा नाम मुहम्मद शाद सिद्दीकी है जिसका जन्म 16 अगस्त 1999 को मदनपुर, देवरिया (उ. प्र.) में हुआ.

डॉ. कुमार विश्वास के साथ शाद



शाद की शुरुआती शिक्षा गाँव के ही एक विद्यालय से प्राप्त हुई. आगे की शिक्षा स्प्रिंगर पब्लिक स्कूल देवरिया से प्राप्त हुई, वो वर्तमान में लखनऊ से मेडिकल द्वितीय वर्ष का छात्र है.

शाद इस समय इंदिरा नगर, लखनऊ में रहता है जिसे शाद ने लिखने से मना किया था क्योंकि शाद को एकांत पसंद है, इसलिए पाठकों से निवेदन है कृपया उसे ढूढ़ने ना लग जायें.

शाद ने अपने साहित्य जीवन की शुरूवात गीतों से की थी, वो बताता है कि उसके प्रेरणाश्रोत आदरणीय नीरज जी रहें है, बाद में शाद को लगा कि उसकी तासीर ग़ज़ल वाली है, जिसके बाद उसने ग़ज़लों पर काम करना शुरू किया.
शाद की ग़ज़लों में एक नयापन है, यही नयापन शाद को हमारे इस सेगमेंट का हिस्सा बनाता है.


शाद की एक ग़ज़ल के कुछ शेर मुझे बहुत पसंद हैं,

वो लिखता है –


मेरी होने को हर रिश्ते को चाकू मार देती है
वो अपनी ज़िंदगी के सारे पहलू मार देती है

उसे किस ने कहा मैं रौशनी में सो नहीं पाता
वो मेरी नींद के चक्कर मे जुगनू मार देती है.


शाद की कुछ और ग़ज़लें जिसे लोगों ने खूब पसंद किया –

1.

अच्छा है पर इस से अच्छा हो सकता है
चाँद के बदले उस का चेहरा हो सकता है

ओ आज़ाद ख़यालों वाली लड़की सुन
इश्क़ भी आगे चल कर पिंजरा हो सकता है

क़ुर्बत की ख़्वाहिश है लेकिन डरता हूँ
ज़्यादा पास आने से झगड़ा हो सकता है

2.

जितना आसान है दुश्वार भी हो सकता है
इश्क़ नेमत है पर आज़ार भी हो सकता है

हर दफ़ा बात मुहब्बत से नहीं बन सकती
अम्न के वास्ते यलगा़र भी हो सकता है

तेरी हर बात पे ख़ामोश जो रहता हूँ
मैं ये किसी बात का इज़हार भी हो सकता है

अश्क़ तो अश्क़ हैं आंखों से निकल आते हैं
जिस्म तो जिस्म है बीमार भी हो सकता है

मेरी तहज़ीब को कमज़ोरी समझने वाले
अब तेरे हुक़्म से इनकार भी हो सकता है.


शाद बताता है कि वो अभी भी गीत लिखता है, हालांकि वो इसे लोगों के सामने नहीं लाया, फिर भी मैं शाद का एक गीत नीचे डालता हूँ जिससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि शाद जितना अच्छा शायर है उतना ही अच्छा गीतकार भी है.

गीत –


कुछ दिन से
अंतर्मन का आशाओं से संवाद नहीं है
पीड़ा है अवसाद नहीं है

हम ने इक छोटे से क्षण को
अपनी सदियाँ दे डाली थीं
मूक बने और अपनी सारी
शब्दावलियाँ दे डाली थीं

क्या-क्या खोया बोध है लेकिन
क्या पाया है याद नहीं है

पीड़ा है अवसाद नहीं है

ख़ुद को पाने की कोशिश में
ख़ुद को ही हम हार चुके हैं
एक भूमिका जीने में
अस्तित्व स्वयं का मार चुके हैं

मन का हर कोना चोटिल है
यूँ हीं अंतर्नाद नहीं है

पीड़ा है अवसाद नहीं है

आने वाले कल की चिंता
वर्तमान की हत्यारिन है
पूछ रहा है जीवन हम से
यह जीवन भी क्या जीवन है

हम ने वो आरंभ चुना है
कुछ भी जिस के बाद नहीं है

पीड़ा है अवसाद नहीं है

शाद

मैं वापस आऊंगा फिर ऐसे ही किसी आर्टिकल के साथ तब तक के लिए धन्यवाद.

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